Wednesday, 4 November 2026
ग्वालियर का दशहरा पर्व

ग्वालियर का दशहरा पर्व

ग्वालियर का दशहरा पर्व 

शमी का वृक्ष सिंधिया की तलवार के छूते ही 

“सोने जैसी पत्तियां” लूटने के लिए टूट पड़े लोग

विशेष रिपोर्ट  - रमेश महेन्द्रू 

क्या आपने कभी ऐसा दशहरा देखा है, जहां राजा की तलवार एक पेड़ को छूती है और कुछ ही मिनटों में उस पेड़ की पत्तियां “सोना” बनकर लोगों के हाथों में पहुंच जाती हैं?

ग्वालियर में ज्योतिरादित्य सिंधिया का विजयादशमी मनाने का तरीका सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि तीन सदियों पुरानी शाही परंपरा, पूर्वजों के प्रति भावुक श्रद्धा और असत्य पर सत्य की जीत का जीवंत उत्सव है। यहां दशहरा राजसी ठाठ में मनाया जाता है, लेकिन इसकी जड़ें आज भी परिवार, परंपरा और प्रजा के साथ जुड़ी हुई हैं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया इस दिन पारंपरिक राजसी पोशाक और मराठी पगड़ी में सजते हैं। वे अपने बेटे युवराज महान आर्यमन सिंधिया के साथ जयविलास पैलेस से विंटेज रोल्स रॉयस में सवार होकर निकलते हैं।

यह नजारा अपने आप में ऐसा है कि लगता है इतिहास आज भी सांस ले रहा है। सबसे पहले गोरखी स्थित देवघर में रियासतकालीन शस्त्रों का पूजन होता है। मंत्रोच्चार के बीच महाआरती होती है और पारंपरिक ध्वजा पूजन किया जाता है। 

इसके बाद जयविलास पैलेस में राजपरिवार के प्रतीक चिह्नों का पूजन होता है। लेकिन इस दिन की सबसे भावुक तस्वीर तब बनती है जब ज्योतिरादित्य सिंधिया अम्मा महाराज की छत्री पहुंचते हैं। यहां वे अपनी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया, पिता माधवराव सिंधिया और माता माधवी राजे सिंधिया को श्रद्धांजलि देते हैं। राजसी ठाठ के बीच एक बेटे का पिता की याद में झुकना बताता है कि राजपाट से बड़ी चीज परिवार और संस्कार होते हैं।

इसके बाद कुलदेवी मांढरे की माता मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे परिवार की आस्था और परंपरा की निरंतरता दिखती है।

इसके बाद आता है वह अनोखा पल, जो ग्वालियर के दशहरे की सबसे खास पहचान है। दशहरा मैदान में पवित्र शमी वृक्ष का पूजन होता है। परंपरा के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी तलवार से शमी की डाल को स्पर्श करते हैं। जैसे ही तलवार शमी को छूती है, वहां मौजूद लोग सोने के प्रतीक के रूप में शमी की पत्तियां लेने के लिए टूट पड़ते हैं। कुछ ही मिनटों में पौधे पर एक भी पत्ती नहीं बचती। लोग इन पत्तियों को एक-दूसरे को बांटते हैं, सिंधिया परिवार को भी देते हैं और सभी लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। 

यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और हर साल हजारों लोगों को अपनी ओर खींचती है। पूजा के बाद राजदरबार लगता है, जहां सिंधिया राजवंश के सरदार परिवार पारंपरिक मराठी पोशाक और पगड़ी में ज्योतिरादित्य और महानआर्यमन का स्वागत करते हैं। यह दृश्य ग्वालियर की शाही विरासत को आज भी जीवंत बनाए रखता है।

इस दशहरे की असली ताकत सिर्फ रोल्स रॉयस, तलवार या राजदरबार नहीं है। इसकी ताकत है परंपरा के साथ भावना, राजसी वैभव के साथ जमीन से जुड़ाव और पूर्वजों की याद के साथ प्रजा के उल्लास का संगम।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए विजयादशमी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि तीन सदियों की विरासत को अपने बेटे के हाथों में सौंपने का पावन अवसर है। ग्वालियर के लोगों के लिए यह वह दिन है जब शमी की एक पत्ती भी “सोने” से कम नहीं लगती।

Published on: 22 Oct 2026

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Ramesh Mahendru
editor@bigbossindiatoday.com
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