संपादकीय
दशहरा पर्व
बुराई पर अच्छाई की विजय और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प
सुप्रिया जमवाल
कार्यकारी संपादक
बिग बॉस इण्डिया टूडे — हिन्दी न्यूज चैनल
भारत त्योहारों और सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध भूमि है। यहां मनाया जाने वाला प्रत्येक पर्व अपने भीतर जीवन को सही दिशा देने वाली कोई न कोई प्रेरणा समेटे हुए है। दशहरा अथवा विजयादशमी भी ऐसा ही पावन पर्व है, जो हमें सत्य, धर्म, न्याय और सदाचार की राह पर चलने का संदेश देता है। यह पर्व याद दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, अंततः विजय सत्य और अच्छाई की ही होती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी का पर्व भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में मनाया जाता है। यह दिन शक्ति की उपासना और धर्म की स्थापना का भी प्रतीक है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस अवसर पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इन आयोजनों के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया जाता है कि अहंकार, अन्याय और अधर्म का अंत निश्चित है।
रावण दहन के साथ बुराइयों का अंत भी जरूरी
दशहरा मनाने का वास्तविक उद्देश्य केवल रावण के पुतले जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद बुराइयों को पहचानकर उन्हें समाप्त करने का संकल्प लेना भी है। आज समाज के सामने भ्रष्टाचार, नशाखोरी, महिलाओं के प्रति अपराध, जातिगत भेदभाव, लालच, हिंसा और असहिष्णुता जैसी अनेक चुनौतियां हैं। इन बुराइयों पर विजय प्राप्त किए बिना एक स्वस्थ और सशक्त समाज की कल्पना अधूरी है।
हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या हम अपने व्यवहार में सत्य और ईमानदारी को पर्याप्त स्थान दे रहे हैं? क्या हम दूसरों के अधिकारों और सम्मान का ध्यान रखते हैं? क्या हम अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस रखते हैं? यदि दशहरे के अवसर पर हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजें और अपने आचरण में सकारात्मक बदलाव लाएं, तो इस पर्व की सार्थकता और बढ़ जाएगी।
अहंकार नहीं, विनम्रता है सच्ची शक्ति
रावण विद्वान और शक्तिशाली होने के बावजूद अपने अहंकार तथा गलत निर्णयों के कारण विनाश की ओर बढ़ा। यह प्रसंग हमें समझाता है कि केवल ज्ञान, धन और शक्ति से व्यक्ति महान नहीं बनता। महानता का वास्तविक आधार विवेक, मर्यादा, विनम्रता और दूसरों के प्रति सम्मान है।
आज के दौर में व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र तक, संवाद और सहिष्णुता की आवश्यकता है। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेदों को दुश्मनी में बदल देना उचित नहीं। हमें दूसरों के विचारों का सम्मान करते हुए सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े रहने की प्रेरणा भगवान श्रीराम के आदर्शों से लेनी चाहिए।
नारी सम्मान और सामाजिक न्याय का संदेश
दशहरे का पर्व हमें महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान के प्रति भी संवेदनशील बनाता है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वहां महिलाओं को कितना सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर मिलता है। महिलाओं के प्रति हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव जैसी बुराइयों को समाप्त करना समाज के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
इसी प्रकार, हमें जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक स्थिति के आधार पर होने वाले भेदभाव से ऊपर उठकर सामाजिक एकता को मजबूत करना चाहिए। त्योहार तभी सार्थक होते हैं, जब उनकी खुशियां समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचें और हर व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित तथा सम्मानित महसूस करे।
नई पीढ़ी को संस्कार और आदर्श देना आवश्यक
आज की युवा पीढ़ी देश का भविष्य है। बच्चों और युवाओं को दशहरे की धार्मिक कथा के साथ-साथ उसके नैतिक और सामाजिक संदेशों से भी परिचित कराना चाहिए। उन्हें सिखाना चाहिए कि सफलता का रास्ता मेहनत, ईमानदारी, अनुशासन और सकारात्मक सोच से होकर गुजरता है।
परिवार, शिक्षण संस्थानों और मीडिया को मिलकर ऐसी जागरूकता विकसित करनी चाहिए, जिससे युवा गलत रास्तों से बचें, नशे जैसी बुराइयों से दूर रहें और देश के जिम्मेदार नागरिक बनें। रामायण के आदर्श हमें कर्तव्यनिष्ठा, परिवार के प्रति जिम्मेदारी, मित्रता, त्याग और न्याय का महत्व समझाते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के साथ मनाएं दशहरा
समय की मांग है कि हम अपने त्योहारों को पर्यावरण के अनुकूल भी बनाएं। रावण दहन के आयोजनों में पर्यावरणीय नियमों का पालन किया जाए, ध्वनि और वायु प्रदूषण को कम करने के प्रयास हों तथा सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता बनाए रखी जाए। धार्मिक उत्सवों की गरिमा तभी बढ़ेगी, जब हम प्रकृति और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझेंगे।
निष्कर्ष: अपने भीतर के रावण को हराएं
दशहरा केवल अतीत की एक विजय का उत्सव नहीं, बल्कि वर्तमान को बेहतर बनाने और भविष्य को उज्ज्वल करने का अवसर है। भगवान श्रीराम के आदर्श हमें सिखाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, धैर्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश तभी जीवंत होगा, जब हम अपने जीवन में ईमानदारी, करुणा, न्याय और मानवता को अपनाएंगे।
आइए, इस विजयादशमी पर हम संकल्प लें कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लालच और द्वेष को समाप्त करेंगे। समाज में प्रेम, भाईचारे और सद्भाव को बढ़ावा देंगे तथा अन्याय के विरुद्ध खड़े होकर एक बेहतर भारत के निर्माण में योगदान देंगे।
याद रखिए, रावण का पुतला जलाना परंपरा है, लेकिन अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करना ही दशहरे का वास्तविक संदेश है।
समस्त देशवासियों को दशहरा एवं विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। यह पावन पर्व सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और नई आशाओं का संचार करे।