संपादकीय
श्राद्ध एवं पितृपक्ष
पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
26 सितम्बर से 10 अक्तूबर 2026 तक
रमेश महेन्द्रू - मुख्य संपादक
पितृपक्ष भारतीय संस्कृति में परिवार, संस्कार और पूर्वजों के प्रति सम्मान का विशेष स्थान है। पितृपक्ष इसी भावना को जीवंत करने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक अवसर है। इस अवधि में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए श्राद्ध, तर्पण तथा अन्य धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं।
पितृपक्ष हमें यह संदेश देता है कि हमारा वर्तमान केवल हमारे अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे हमारे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अनेक पूर्वजों का त्याग, संघर्ष और योगदान भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने परिवार और समाज के निर्माण में जो भूमिका निभाई, उसे याद करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। श्राद्ध का वास्तविक अर्थ केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। श्रद्धा, स्मरण, सेवा और कृतज्ञता इसकी मूल भावना हैं। पूर्वजों की स्मृति में जरूरतमंदों की सहायता करना, अन्नदान करना, गौसेवा, पक्षियों एवं जीव-जंतुओं को भोजन देना तथा परिवार में सद्भाव बनाए रखना भी इस भावना को सार्थक बना सकता है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नई पीढ़ी का अपने पारिवारिक इतिहास और संस्कारों से जुड़ाव कम होता जा रहा है। ऐसे में पितृपक्ष हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देता है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि जीवन क्षणभंगुर है और आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छे संस्कार, मानवीय मूल्यों तथा सेवा की भावना छोड़ना ही सबसे बड़ी विरासत है।
26 सितम्बर से 10 अक्तूबर 2026 तक चलने वाला पितृपक्ष श्रद्धा और आत्मचिंतन का अवसर है। आइए, हम अपने पूर्वजों को नमन करें, उनकी स्मृतियों को सम्मान दें और उनके दिखाए सदाचार, परिश्रम, त्याग तथा मानवता के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।
पूर्वजों का सम्मान केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और अपनी पहचान के प्रति कृतज्ञता है।